संगठन ने बताया कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 13 जनवरी 2026 को यह रेगुलेशन जारी किया था, जो 15 जनवरी 2026 को राजपत्र में अधिसूचित हुआ। ज्ञापन में आरोप लगाया गया कि इसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और दिव्यांग छात्रों के अधिकारों पर विशेष जोर दिया गया है, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों के संवैधानिक संरक्षण को नजरअंदाज किया गया है। संगठन ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 में निहित समानता के अधिकार के विपरीत बताया है।
झूठी शिकायतों पर सजा का प्रावधान नहीं
ज्ञापन में इक्विटी कमेटियों के अधिकारों पर चिंता जताई गई है। रेगुलेशन के मुताबिक, सभी विश्वविद्यालयों में 90 दिनों के भीतर इक्विटी कमेटियां गठित की जानी हैं, जिन्हें शिकायतों की जांच का अधिकार होगा। संगठन ने आशंका जताई है कि रेगुलेशन में झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर किसी तरह के दंडात्मक प्रावधान नहीं हैं, जिससे इसका दुरुपयोग हो सकता है। इससे शैक्षणिक परिसरों में भय और असंतोष का माहौल बनेगा।
आंदोलन और कानूनी लड़ाई की चेतावनी
संगठन ने कहा कि देश की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा सामान्य वर्ग से है, जिसका शिक्षा और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान है। ऐसी एकतरफा नीतियां करोड़ों छात्रों के अधिकारों को प्रभावित कर रही हैं। संगठन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मांग की है कि सभी वर्गों के हितों को ध्यान में रखकर निष्पक्ष और संतुलित नीति बनाई जाए। चेतावनी दी गई है कि यदि अधिसूचना वापस नहीं ली गई, तो लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन किया जाएगा और जरूरत पड़ने पर कानूनी विकल्प भी अपनाए जाएंगे।