सागर शर्मा शिवपुरीEGC👁️:शिवपुरी नवरात्रि के पावन अवसर पर आयोजित बलारपुर मेला भले ही आस्था और भक्ति का केंद्र रहा हो, लेकिन मेले के समापन के बाद जो तस्वीर सामने आई है, उसने व्यवस्था और जिम्मेदारी दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जंगल क्षेत्र में फैली गंदगी अब पर्यावरण और वन्यजीवों के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है।
मंदिर के आसपास करीब 1 से 2 किलोमीटर तक का पूरा इलाका कचरे के ढेर में तब्दील हो गया है। हजारों की संख्या में पॉलिथीन, थर्माकोल और बचा हुआ भोजन जंगल में बिखरा पड़ा है। चिंताजनक बात यह है कि मवेशी और जंगली जानवर इस कचरे को खाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे उनकी जान पर सीधा खतरा मंडरा रहा है।
यह वही समस्या है जो अब तक शहरों तक सीमित थी, लेकिन अब जंगलों में भी फैल चुकी है — क्या यह आने वाले बड़े पर्यावरणीय संकट की चेतावनी नहीं है?
प्रतिबंध सिर्फ कागजों तक सीमित?
प्रशासन ने मेले से पहले ही सख्त निर्देश जारी किए थे। कलेक्टर द्वारा स्पष्ट रूप से पॉलिथीन, डीजे, लाउडस्पीकर और अन्य प्रतिबंधित गतिविधियों पर रोक लगाई गई थी, ताकि वन्यजीवों को किसी भी प्रकार की परेशानी न हो।
लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।
23 से 25 मार्च के बीच जंगल में तेज आवाज में डीजे बजते रहे, नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई गईं और जिम्मेदार अधिकारी मूकदर्शक बने रहे।
सवाल जो जवाब मांगते हैं:
जब पहले से प्रतिबंध था तो फिर पॉलिथीन और डीजे कैसे पहुंचे जंगल तक?
क्या प्रशासन ने सिर्फ आदेश जारी कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली?
मौके पर निगरानी और कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
वन विभाग और स्थानीय प्रशासन आखिर कर क्या रहा था?
जनता भी कम दोषी नहीं!
इस पूरे मामले में सिर्फ प्रशासन ही नहीं, बल्कि आमजन भी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। आस्था के नाम पर जंगल को कचरा घर बना देना कहीं से भी उचित नहीं कहा जा सकता।
भंडारों के बाद सफाई की जिम्मेदारी निभाना भी उतना ही जरूरी है जितना आयोजन करना।
निष्कर्ष:
बलारपुर मेला एक बार फिर यह साबित कर गया कि जब तक प्रशासन सख्ती नहीं दिखाएगा और जनता जागरूक नहीं होगी, तब तक ऐसे आयोजन पर्यावरण के लिए अभिशाप बनते रहेंगे।
अब जरूरत है तत्काल सफाई अभियान, दोषियों पर कार्रवाई और भविष्य में सख्त नियमों के पालन की — वरना अगली बार यह नुकसान और बड़ा हो सकता है।