“करोड़ों के घोटाले में पार्षदों को हाईकोर्ट का झटका!”अब सरकारी वकील ही लड़ेगा केस, निजी पैरवी पर कोर्ट ने लगाई रोक

Nikk Pandit
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सागर शर्मा शिवपुरी:खबर शिवपुरी नगर पालिका के चर्चित करोड़ों रुपए के कथित सड़क घोटाले में अब बड़ा कानूनी मोड़ आ गया है। भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाने वाले पार्षदों को ग्वालियर हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कह दिया कि “भ्रष्टाचार उजागर करने वाला व्यक्ति या पार्षद खुद कोर्ट में अभियोजन पक्ष बनकर जिरह नहीं कर सकता।” इस फैसले के बाद शहर की राजनीति में हलचल तेज हो गई है।

ग्वालियर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव शामिल थे, ने पार्षद विजय शर्मा की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि सत्र न्यायालय में मुकदमे की पैरवी करने, गवाहों से सवाल-जवाब करने और बहस करने का अधिकार केवल लोक अभियोजक यानी सरकारी वकील को ही है। किसी निजी व्यक्ति को यह अधिकार देना कानून और निष्पक्ष सुनवाई की भावना के खिलाफ होगा।

दरअसल, नगर पालिका के कथित सड़क निर्माण घोटाले में शिकायत करने वाले पार्षद चाहते थे कि उन्हें सरकारी वकील के साथ मिलकर कोर्ट में गवाहों से जिरह करने और अंतिम बहस में शामिल होने की अनुमति दी जाए। उनका कहना था कि घोटाले का खुलासा उन्होंने किया है, इसलिए मामले की पूरी जानकारी भी उनके पास है।

लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने अपने आदेश में दो टूक कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत सत्र न्यायालय में अभियोजन चलाने का अधिकार केवल सरकारी पक्ष को है। निजी व्यक्ति केवल लिखित सुझाव या लिखित तर्क दे सकता है, वह भी तब जब कोर्ट अनुमति दे और गवाही की प्रक्रिया पूरी हो चुकी हो। यानी अब पार्षद सीधे कोर्ट में “सरकारी वकील” जैसी भूमिका नहीं निभा सकेंगे।

इस फैसले के बाद शहर में चर्चाएं तेज हो गई हैं। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर ऐसा कौन सा मामला था जिसमें पार्षद खुद कोर्ट में उतरकर लड़ाई लड़ना चाहते थे? वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों का कहना है कि यदि शिकायतकर्ताओं को खुली पैरवी की छूट मिल जाए तो मुकदमे राजनीतिक रंग ले सकते हैं और निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।

पूरा मामला नगर पालिका के कथित सड़क घोटाले से जुड़ा है। 21 जुलाई 2025 को शिवपुरी नगर पालिका के 21 पार्षदों ने कलेक्टर को शिकायत देकर आरोप लगाया था कि कई सड़कें सिर्फ कागजों में बनाईं गईं, जबकि जमीन पर निर्माण अधूरा या गायब था। जांच में गड़बड़ियां सामने आने के बाद कोतवाली पुलिस ने सब इंजीनियर जितेंद्र परिहार, सतीश निगम और ठेकेदार अर्पित शर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी की धाराओं में मामला दर्ज किया था।

पहले विशेष न्यायालय (पीसी एक्ट) शिवपुरी ने पार्षदों की निजी पैरवी वाली मांग खारिज कर दी थी। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा, लेकिन वहां भी राहत नहीं मिली। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही मानते हुए याचिका खारिज कर दी। अब इस पूरे मामले में आगे की लड़ाई पूरी तरह सरकारी वकील के हाथ में रहेगी।
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