शिवपुरी के अमरपुर टपरियन गांव की तस्वीर ने व्यवस्था पर खड़े किए सवाल; लकड़ियां भीगीं तो टायरों का लिया सहारा, ग्रामीण बोले—कई बार मांग के बाद भी नहीं बना मुक्तिधाम
खबर:शिवपुरी इंसान के जीवन में सबसे अंतिम पड़ाव भी अगर सम्मानजनक नसीब न हो तो इससे बड़ी विडंबना क्या होगी। शिवपुरी जिले के कोलारस जनपद की ग्राम पंचायत कुमरौआ के अमरपुर टपरियन गांव से सामने आई एक तस्वीर ने ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं की हकीकत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। गांव में व्यवस्थित मुक्तिधाम नहीं होने के कारण एक महिला के निधन के बाद परिजनों को खेत में अंतिम संस्कार करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
बारिश के मौसम ने परिवार की मुश्किल और बढ़ा दी। अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियों की व्यवस्था करना आसान नहीं था और जो लकड़ियां मिलीं, वे भी बारिश के कारण ठीक से जल नहीं पा रही थीं। हालात ऐसे बने कि परिजनों को शव के अंतिम संस्कार के लिए साइकिल के टायरों का सहारा लेना पड़ा।
यह मामला सामने आने के बाद ग्रामीणों में नाराजगी है और गांव में जल्द से जल्द व्यवस्थित मुक्तिधाम बनाए जाने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है।
गांव में नहीं है अंतिम संस्कार की व्यवस्थित जगह
ग्रामीण सचिन कुशवाह के मुताबिक, उनकी भाभी मनीषा कुशवाह का निधन हो गया था। परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती अंतिम संस्कार की थी। गांव में कोई ऐसा निर्धारित और व्यवस्थित मुक्तिधाम नहीं है, जहां बारिश या किसी भी मौसम में अंतिम संस्कार आसानी से किया जा सके।
सामान्य दिनों में ग्रामीण नदी किनारे अंतिम संस्कार करते हैं, लेकिन बारिश के दिनों में नदी और वहां तक पहुंचने वाले रास्तों की स्थिति खराब हो जाती है। पानी और कीचड़ के कारण शव को नदी किनारे ले जाना भी मुश्किल हो जाता है।
ऐसे हालात में परिवार को गांव के पास खेत में ही अंतिम संस्कार करना पड़ा।
बारिश ने बढ़ाई मुश्किल, लकड़ियां नहीं जलीं तो टायरों का सहारा
अंतिम संस्कार जैसी संवेदनशील घड़ी में परिवार पहले ही दुख से टूट चुका था। ऊपर से बारिश और खराब व्यवस्था ने परेशानी और बढ़ा दी।
बताया गया कि बारिश के कारण लकड़ियां ठीक से उपलब्ध नहीं हो सकीं और गीली लकड़ियों के कारण अंतिम संस्कार में भी परेशानी आई। हालात इतने कठिन हो गए कि साइकिल के टायरों का इस्तेमाल करके चिता को जलाने की कोशिश करनी पड़ी।
यह तस्वीर ग्रामीण व्यवस्था की उस मजबूरी को सामने लाती है, जहां किसी परिवार को अपने प्रियजन को अंतिम विदाई देने के लिए भी मौसम और संसाधनों से जूझना पड़ रहा है।
सवाल सिर्फ एक परिवार का नहीं, पूरे गांव का है
ग्रामीणों का कहना है कि यह समस्या केवल मनीषा कुशवाह के परिवार तक सीमित नहीं है। गांव में जब भी किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, परिजनों के सामने अंतिम संस्कार के लिए उचित स्थान की समस्या खड़ी हो जाती है।
गर्मी के दिनों में नदी किनारे अंतिम संस्कार किसी तरह हो जाता है, लेकिन बारिश में नदी का जलस्तर बढ़ने, रास्तों में कीचड़ और आवागमन बाधित होने से स्थिति बेहद कठिन हो जाती है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि गांव में शेड, चबूतरा, पहुंच मार्ग और अन्य जरूरी सुविधाओं से युक्त मुक्तिधाम होता तो किसी परिवार को इस तरह खेत में अंतिम संस्कार करने की नौबत नहीं आती।
लंबे समय से उठ रही मुक्तिधाम की मांग
अमरपुर टपरियन के ग्रामीणों के मुताबिक, गांव में मुक्तिधाम निर्माण की मांग कोई नई नहीं है। ग्रामीण लंबे समय से पंचायत और संबंधित अधिकारियों के सामने यह समस्या रखते आए हैं।
कई बार आवेदन देने के बावजूद अब तक गांव में व्यवस्थित मुक्तिधाम का निर्माण नहीं हो सका है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते इस मांग पर ध्यान दिया जाता तो बारिश के दिनों में परिवारों को इस तरह की परेशानी नहीं उठानी पड़ती।
अब मनीषा कुशवाह के अंतिम संस्कार की घटना के बाद ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि मामले को गंभीरता से लेते हुए गांव में जल्द से जल्द मुक्तिधाम का निर्माण कराया जाए।
CM हेल्पलाइन 181 तक पहुंची शिकायत
मुक्तिधाम निर्माण की मांग को लेकर ग्रामीण सचिन कुशवाह ने CM हेल्पलाइन 181 पर भी शिकायत दर्ज कराई थी। उनका आरोप है कि शिकायत दर्ज होने के बाद उस शिकायत को वापस लेने अथवा कटवाने के लिए उन पर दबाव बनाया जा रहा है।
यदि ग्रामीण का यह आरोप सही है तो यह भी जांच का विषय है कि आखिर सरकारी सुविधा से जुड़ी शिकायत को वापस लेने के लिए किसी व्यक्ति पर दबाव क्यों बनाया जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि शिकायत का समाधान करने के बजाय यदि शिकायतकर्ता पर ही दबाव बनाया जाएगा तो गांव की समस्याएं आखिर किसके सामने रखी जाएंगी।
बारिश में हर अंतिम संस्कार बन जाता है चुनौती
अमरपुर टपरियन की समस्या को केवल एक मुक्तिधाम के निर्माण से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं होगा। ग्रामीणों के लिए यह सम्मान और बुनियादी सुविधा का सवाल है।
किसी परिवार में मौत होने के बाद परिजनों को पहले ही मानसिक और भावनात्मक पीड़ा से गुजरना पड़ता है। ऐसे समय में अंतिम संस्कार के लिए जगह, रास्ते और जरूरी सुविधाओं की व्यवस्था न होना परेशानी को कई गुना बढ़ा देता है।
बारिश के मौसम में खेत में अंतिम संस्कार करना और फिर चिता जलाने के लिए साइकिल के टायरों का सहारा लेना निश्चित रूप से व्यवस्था के सामने गंभीर सवाल खड़े करता है।
अब प्रशासन से ग्रामीणों को उम्मीद
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि अमरपुर टपरियन में जल्द से जल्द व्यवस्थित मुक्तिधाम का निर्माण कराया जाए। ग्रामीण चाहते हैं कि मुक्तिधाम में पक्का चबूतरा, बारिश से बचाव के लिए शेड, शव ले जाने के लिए उचित रास्ता और अंतिम संस्कार से जुड़ी आवश्यक मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हों।
ग्रामीणों का कहना है कि मुक्तिधाम जैसी मूलभूत सुविधा के लिए उन्हें बार-बार आवेदन और शिकायत करने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। पंचायत और प्रशासन को गांव की आवश्यकता को समझते हुए स्थायी समाधान करना चाहिए।
अमरपुर टपरियन की यह घटना सिर्फ एक परिवार के दर्द की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर बड़ा सवाल है जहां अंतिम विदाई के लिए भी ग्रामीणों को खेत, बारिश और जुगाड़ का सहारा लेना पड़ रहा है। अब देखना यह है कि इस घटना के बाद प्रशासन की नींद टूटती है या ग्रामीणों की मुक्तिधाम की मांग एक बार फिर कागजों में दबकर रह जाती है।
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