झांसी तिराहे से हटेगा गांधी पेट्रोल पंप:हाईकोर्ट के फैसले के बाद नपा ने कसी कमर:15 दिन में जमीन खाली कराने की तैयारी

Nikk Pandit
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खुशबू शर्मा खबर:शिवपुरी शहर के सबसे व्यस्त और बेशकीमती इलाकों में शामिल झांसी तिराहे पर करीब 66 साल से चला आ रहा भूमि विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर पीठ के फैसले के बाद करीब 13,600 वर्गफीट जमीन पर मेसर्स जय भारत ऑटोमोबाइल्स के दावे खारिज हो गए हैं। मौजूदा बाजार कीमत के हिसाब से इस जमीन की कीमत 50 करोड़ रुपए से अधिक बताई जा रही है। हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब नगर पालिका प्रशासन ने जमीन को अपने कब्जे में लेने की प्रक्रिया तेज कर दी है।

नगर पालिका की ओर से बुधवार को जय भारत ऑटोमोबाइल्स, गांधी पेट्रोल पंप संचालक, सुधीर ऑटोमोबाइल्स और अन्य संबंधित कब्जाधारियों को बेदखली नोटिस जारी किए जाने की तैयारी है। नोटिस में जमीन खाली करने के लिए 15 दिन का समय दिए जाने की बात सामने आई है। इसके बाद यदि जमीन खाली नहीं की जाती है तो प्रशासनिक मदद लेकर आगे की कार्रवाई किए जाने की तैयारी है।

मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस जमीन को लेकर वर्षों से विवाद चला आ रहा था, वह शहर के सबसे व्यस्त झांसी तिराहे पर स्थित है। यहां पेट्रोल पंप सहित अन्य व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं। ऐसे में हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब असली सवाल कब्जा हटाने और जमीन को नगर पालिका के वास्तविक कब्जे में लेने का है।

1960 में महज 279.50 रुपए सालाना किराए पर दी गई थी जमीन

नगर पालिका के अनुसार इस विवाद की शुरुआत वर्ष 1960 में हुई थी। एबी रोड पर झांसी तिराहे के पास ब्लॉक क्रमांक 1, 2, 3 और 4 की जमीन लीज पर दी गई थी। उस समय जमीन का मूल प्रीमियम करीब 4,472 रुपए और वार्षिक किराया मात्र 279.50 रुपए निर्धारित था। लीज की अवधि 25 वर्ष रखी गई थी।

लीज की शर्तों के अनुसार अवधि समाप्त होने से छह महीने पहले नवीनीकरण के लिए आवेदन किया जाना आवश्यक था। नगर पालिका का पक्ष रहा कि निर्धारित प्रक्रिया और शर्तों का पालन नहीं किया गया। इसी के बाद जमीन को लेकर विवाद अदालत तक पहुंच गया और करीब छह दशक से अधिक समय तक मामला विभिन्न न्यायिक स्तरों पर चलता रहा।

हाईकोर्ट ने स्वतः नवीनीकरण के दावे को स्वीकार नहीं किया

मामले की द्वितीय अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की एकल पीठ ने निचली अदालतों के पूर्व फैसलों को पलटते हुए नगर पालिका के पक्ष में निर्णय दिया। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि केवल नवीनीकरण के लिए आवेदन करने या कुछ राशि जमा करने मात्र से लीज स्वतः नवीनीकृत नहीं मानी जा सकती।

मामले में एक महत्वपूर्ण बिंदु यह भी रहा कि लीज की शर्तों के उल्लंघन का आरोप सामने आया। नगर पालिका के अनुसार फर्म द्वारा जमीन का उपयोग अन्य लोगों और संस्थाओं को दिए जाने से संबंधित भी सवाल उठे थे। हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब नगर पालिका के सामने जमीन को खाली कराने और अपने कब्जे में लेने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हुआ है।

50 करोड़ की जमीन, अब नपा की नजर कब्जे पर

इस पूरे मामले का सबसे बड़ा पहलू जमीन की मौजूदा कीमत है। करीब 13,600 वर्गफीट जमीन शहर के बेहद महत्वपूर्ण व्यावसायिक स्थान पर स्थित है। इसकी वर्तमान कीमत 50 करोड़ रुपए से अधिक बताई जा रही है। ऐसे में यह सिर्फ एक पुराने भूमि विवाद का अंत नहीं, बल्कि नगर पालिका की एक बड़ी संपत्ति पर उसके अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।

यही वजह है कि अब लोगों की नजर इस बात पर है कि हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद नगर पालिका कितनी तेजी से जमीन को वास्तविक रूप से अपने कब्जे में लेती है।

15 दिन की समय-सीमा के बाद क्या होगा?

नगर पालिका अधिकारियों के अनुसार संबंधित कब्जाधारियों को 15 दिन में जमीन खाली करने का नोटिस दिया जाएगा। यदि तय अवधि में जमीन खाली नहीं होती है तो नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी और आवश्यकता पड़ने पर प्रशासन की सहायता ली जा सकती है।

यहां एक महत्वपूर्ण सवाल भी सामने आ रहा है—यदि जमीन नगर पालिका की है और न्यायालय का फैसला उसके पक्ष में आ चुका है, तो कब्जा हस्तांतरण की प्रक्रिया में अनावश्यक देरी से नगर पालिका को संभावित राजस्व और संपत्ति-उपयोग का नुकसान हो सकता है या नहीं?

इसका वास्तविक वित्तीय प्रभाव जमीन के उपयोग, लीज देयताओं और न्यायालय/प्रशासन द्वारा तय की जाने वाली अन्य रकम पर निर्भर करेगा। इसलिए निश्चित नुकसान की राशि बताना अभी उचित नहीं होगा। लेकिन करोड़ों की बाजार कीमत वाली जमीन को लंबे समय तक पुराने कब्जे में रहने देने से नगर पालिका की संपत्ति के प्रभावी उपयोग में देरी जरूर हो सकती है।

समीर गांधी बोले—15 दिन से अधिक समय की जरूरत पड़ सकती है

गांधी पेट्रोल पंप के संचालक समीर गांधी ने कहा है कि हाईकोर्ट का फैसला आया है और यदि नगर पालिका नोटिस जारी करती है तो जगह खाली करने के लिए 15 दिन से अधिक समय की आवश्यकता हो सकती है। उनका कहना है कि यहां चालू पेट्रोल पंप है और जमीन खाली करने से पहले तेल कंपनी के साथ भी समन्वय करना पड़ेगा।

यहीं से अब अगला बड़ा सवाल पैदा होता है—क्या 15 दिन के बाद भी समय बढ़ेगा या हाईकोर्ट के आदेश के अनुरूप नगर पालिका अपनी कार्रवाई तय समय-सीमा में पूरी करेगी?

नगर पालिका के लिए यह मामला केवल जमीन खाली कराने का नहीं है। यह उसकी करोड़ों रुपए की संपत्ति को वास्तविक नियंत्रण में लेने और भविष्य में उससे राजस्व अर्जित करने का भी विषय है। यदि अतिरिक्त समय दिया जाता है तो उसका निर्णय स्पष्ट कानूनी आधार और सक्षम आदेश के अनुरूप होना होगा।

1999 से बकाया लीज राशि भी वसूली जाएगी

हाईकोर्ट के फैसले के बाद नगर पालिका ने बकाया लीज राशि की वसूली की तैयारी भी शुरू कर दी है। इसमें वर्ष 1999 से अब तक की देय लीज राशि के साथ पेनल्टी और हर्जाने से संबंधित रकम भी शामिल होने की बात कही गई है। हालांकि वास्तविक वसूली की राशि संबंधित रिकॉर्ड और लागू आदेशों के आधार पर ही स्पष्ट होगी।

इसका मतलब साफ है कि नगर पालिका अब केवल जमीन खाली कराने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि पुराने बकाये का हिसाब भी करने की तैयारी में है।

सीएमओ बोले—लंबे संघर्ष के बाद मिली जीत

नगर पालिका के सीएमओ यशवंत राठौर के अनुसार यह लंबे न्यायिक संघर्ष के बाद मिली महत्वपूर्ण सफलता है। उन्होंने कहा कि संबंधित कब्जाधारियों को 15 दिन में जगह खाली करने का नोटिस दिया जा रहा है। इसके बाद जमीन को नगर पालिका के कब्जे में लेने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।

नगर पालिका के लिए यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि शहर में उसकी कई बेशकीमती जमीनों को लेकर विवाद चल रहे हैं। झांसी तिराहे के मामले में हाईकोर्ट से फैसला आने के बाद अब प्रशासन की निगाह अन्य प्रमुख संपत्तियों पर भी टिक गई है।

अब दुर्गा टॉकीज और माधव चौक की जमीन की बारी?

झांसी तिराहे की जमीन के मामले में फैसला आने के बाद नगर पालिका की नजर अब शहर की दो अन्य महत्वपूर्ण संपत्तियों पर है। इनमें दुर्गा टॉकीज के पास स्थित जमीन और माधव चौक के आसपास नगर पालिका के स्वामित्व वाली जमीन शामिल है।

इन मामलों में भी न्यायालयीन प्रक्रिया जारी है। यदि इन मामलों में भी नगर पालिका के पक्ष में निर्णय आता है तो शहर की बेशकीमती जमीनों को लेकर वर्षों से चले आ रहे विवादों पर विराम लग सकता है और नगर पालिका की संपत्ति का उपयोग भविष्य की योजनाओं के लिए किया जा सकता है।

अब फैसला सिर्फ कागज पर नहीं, जमीन पर दिखना बाकी

झांसी तिराहे की करोड़ों रुपए की जमीन को लेकर 66 साल पुरानी कहानी अब अदालत के फैसले के साथ नए अध्याय में पहुंच गई है। कोर्ट का फैसला आ चुका है, अब नजर नगर पालिका की कार्रवाई पर है।

15 दिन का नोटिस जारी होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि तय अवधि समाप्त होते ही जमीन वास्तव में खाली होती है या फिर अतिरिक्त समय, आपत्तियों अथवा अन्य कानूनी प्रक्रियाओं के चलते मामला फिर लंबा खिंचता है।

एक ओर नगर पालिका करोड़ों रुपए की अपनी संपत्ति को कब्जे में लेने और पुराने बकाये की वसूली की तैयारी कर रही है, वहीं दूसरी ओर पेट्रोल पंप संचालक ने अधिक समय की आवश्यकता जताई है। ऐसे में आने वाले दिनों में झांसी तिराहा एक बार फिर शहर की सबसे बड़ी प्रशासनिक और कानूनी खबरों के केंद्र में रहने वाला है।

अब असली परीक्षा नगर पालिका की है—66 साल पुराने विवाद में अदालत से मिली जीत के बाद क्या 50 करोड़ से अधिक कीमत वाली जमीन वास्तव में तय समय में नगर पालिका के कब्जे में आती है?

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