खुशबू शर्मा खबर: शिवपुरी जिले में साइबर ठगों ने लोगों को अपने जाल में फंसाने के लिए भले ही मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल किया हो, लेकिन अब वही नंबर पुलिस के लिए ठगों तक पहुंचने का रास्ता बन रहे हैं। शिवपुरी जिले में साइबर ठगी के दो मामलों की जांच के दौरान पुलिस ने ठगी में इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबरों को ट्रेस किया है।
जांच के बाद दोनों नंबर अलग-अलग सिम धारकों के नाम पर पाए गए। रिकॉर्ड, साइबर पुलिस से मिली जानकारी और सिम जारी करने वाले एजेंटों से पूछताछ के बाद खनियाधाना और मायापुर थाना पुलिस ने दो अलग-अलग मामले दर्ज किए हैं।
इन मामलों में एक तरफ जहां पुलिस अधिकारी बनकर महाराष्ट्र के औरंगाबाद निवासी से 51,600 रुपए ठगने का मामला सामने आया, वहीं दूसरे मामले में 5 हजार रुपए की साइबर ठगी से जुड़े मोबाइल नंबर की जांच की गई। पुलिस ने दोनों मामलों में संबंधित सिम धारकों के खिलाफ धोखाधड़ी और आईटी एक्ट की धाराओं में प्रकरण दर्ज कर जांच आगे बढ़ा दी है।
पुलिस अधिकारी बनकर बनाया शिकार, 51,600 रुपए खाते में डलवाए
खनियाधाना थाना पुलिस के सामने आए मामले में साइबर ठगी का तरीका चौंकाने वाला था। साइबर पुलिस मुख्यालय से मिले रिकॉर्ड की जांच में सामने आया कि मोबाइल नंबर 6232378702 से महाराष्ट्र के औरंगाबाद निवासी अजिंक्या प्रकाश माली को फोन किया गया था।
फोन करने वाले व्यक्ति ने खुद को पुलिस अधिकारी बताते हुए पीड़ित को अपनी बातों में उलझाया। इसके बाद अलग-अलग ट्रांजेक्शन के माध्यम से पीड़ित से कुल 51,600 रुपए एक बैंक खाते में जमा करा लिए गए।
ठगी की शिकायत और साइबर रिकॉर्ड की जांच आगे बढ़ी तो पुलिस ने उस मोबाइल नंबर की डिटेल खंगालनी शुरू की। जांच में मोबाइल नंबर रामरतन लोधी (71) पुत्र बाघराज लोधी, निवासी मजरा फुटेरा, ग्राम मुहारीखुर्द के नाम पर दर्ज पाया गया।
इसके बाद पुलिस ने केवल सिम धारक के रिकॉर्ड तक मामला सीमित नहीं रखा, बल्कि सिम जारी करने वाले पीओएस एजेंट से भी पूछताछ की। पुलिस ने यह पता लगाने का प्रयास किया कि सिम किस प्रक्रिया से जारी हुआ और उसके लिए कौन-कौन से दस्तावेज इस्तेमाल किए गए थे।
दूसरा नंबर भी पहुंचा पुलिस की जांच के घेरे में
दूसरे मामले में भी साइबर ठगी के लिए इस्तेमाल हुए मोबाइल नंबर की जांच की गई। पुलिस के मुताबिक यह मामला करीब 5 हजार रुपए की साइबर ठगी से जुड़ा है। जांच के दौरान मोबाइल नंबर राममिलन लोधी पुत्र खलक सिंह लोधी, निवासी ग्राम पायगा (कुटियाटोर), थाना मायापुर के नाम पर पाया गया।
पुलिस ने मामले में सिम बेचने वाले पीओएस एजेंट मुकेश तिवारी से पूछताछ की। इसके बाद संबंधित सिम धारक राममिलन लोधी से भी पूछताछ की गई।
पुलिस के अनुसार पूछताछ के दौरान राममिलन लोधी मोबाइल नंबर के इस्तेमाल और उससे जुड़ी साइबर ठगी के संबंध में संतोषजनक जवाब नहीं दे सका। इसके बाद पुलिस ने उपलब्ध रिकॉर्ड और पूछताछ के आधार पर उसके खिलाफ भी कार्रवाई की।
BNS और IT Act की धाराओं में केस
मायापुर थाना पुलिस ने मामले में धारा 318(4), 319(2) बीएनएस और धारा 66(डी) आईटी एक्ट के तहत प्रकरण दर्ज किया है। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि संबंधित मोबाइल नंबर का इस्तेमाल वास्तव में किस व्यक्ति या गिरोह द्वारा किया गया था और सिम धारक की भूमिका क्या रही।
यह जांच इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि साइबर अपराधों में कई बार ठग दूसरे लोगों के नाम से जारी सिम का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में पुलिस के सामने यह पता लगाना जरूरी होता है कि सिम धारक खुद ठगी में शामिल था, उसकी जानकारी के बिना नंबर का इस्तेमाल हुआ या फिर किसी अन्य माध्यम से सिम ठगों तक पहुंची।
एक नंबर से खुल सकता है पूरा नेटवर्क
साइबर अपराध की जांच में मोबाइल नंबर पुलिस के लिए अहम सुराग साबित होते हैं। कॉल डिटेल, सिम रजिस्ट्रेशन, बैंक ट्रांजेक्शन और अन्य डिजिटल रिकॉर्ड को जोड़कर पुलिस यह पता लगाने का प्रयास करती है कि ठगी के पीछे कौन लोग सक्रिय हैं।
51,600 रुपए की ठगी वाले मामले में पुलिस अधिकारी बनकर फोन करने वाले व्यक्ति ने जिस तरीके से पीड़ित को विश्वास में लेकर रकम ट्रांसफर कराई, उससे साफ है कि साइबर अपराधी अब पुलिस अधिकारी, बैंक अधिकारी या अन्य सरकारी संस्थानों के नाम का इस्तेमाल कर लोगों को डराने और भ्रमित करने की कोशिश कर रहे हैं।
पुलिस की जांच अब केवल मोबाइल नंबर तक सीमित नहीं है। ठगी की रकम किस खाते में गई, उस खाते से आगे रकम कहां पहुंची, मोबाइल नंबर का इस्तेमाल किन लोगों ने किया और दोनों मामलों के पीछे कोई साझा नेटवर्क तो नहीं है, इन सभी बिंदुओं पर जांच की जा रही है।
सिम धारकों पर कार्रवाई के बाद बढ़ी हलचल
दो अलग-अलग मामलों में सिम धारकों के खिलाफ केस दर्ज होने के बाद साइबर अपराधों में इस्तेमाल होने वाले मोबाइल नंबरों को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। पुलिस अब ऐसे मामलों में सिम उपलब्ध कराने की प्रक्रिया और दस्तावेजों की भी जांच कर सकती है।
फिलहाल खनियाधाना और मायापुर पुलिस ने दोनों मामलों में प्रकरण दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस का फोकस साइबर ठगी की रकम, मोबाइल नंबरों के इस्तेमाल और उनसे जुड़े लोगों की भूमिका तक पहुंचने पर है।
साइबर ठगी में नंबर छोटा सुराग जरूर है, लेकिन इसी सुराग से पूरा नेटवर्क भी सामने आ सकता है। अब देखना यह है कि पुलिस की आगे की जांच में इन मोबाइल नंबरों के पीछे कौन-कौन से चेहरे सामने आते हैं और 51,600 रुपए तथा 5 हजार रुपए की ठगी की रकम आखिर किन हाथों तक पहुंची थी।