खुशबू शर्मा खबर:शिवपुरी शहर में बुधवार को उस समय हड़कंप मच गया, जब नोन कोल्हू पुलिया के पास सड़क किनारे खुले में पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली बड़ी संख्या में दवाएं पड़ी मिलीं। सड़क किनारे बिखरी इन दवाओं में टेबलेट, सिरप और ट्यूब सहित कई तरह की दवाएं शामिल थीं। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इनमें से कई दवाओं की एक्सपायरी डेट निकल चुकी थी।
दवाएं इस तरह खुले में पड़ी थीं, मानो किसी ने उन्हें इस्तेमाल करने के बजाय रास्ते में ही ठिकाने लगा दिया हो। मामला सामने आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ये दवाएं यहां तक पहुंचीं कैसे? क्या इन्हें किसी अस्पताल या विभागीय स्टोर से निकाला गया था या फिर किसी अन्य स्थान से लाकर यहां फेंका गया? फिलहाल इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा।
पशु अस्पताल और विभागीय कार्यालय से ज्यादा दूर नहीं मिला दवा का ढेर
जिस स्थान पर दवाएं मिली हैं, वह नोन कोल्हू पुलिया से कुछ ही दूरी पर स्थित है। खास बात यह है कि आईटीआई के पास ही जिला पशु चिकित्सालय और पशु विभाग का मुख्य कार्यालय भी मौजूद है। ऐसे में सड़क किनारे पशुओं की दवाएं मिलना कई सवालों को जन्म दे रहा है।
लोगों के बीच चर्चा है कि यदि दवाएं विभागीय उपयोग के लिए थीं तो इन्हें खुले में सड़क किनारे क्यों फेंका गया? और यदि ये एक्सपायरी हो चुकी थीं, तो इन्हें नियमानुसार नष्ट कराने की प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई?
हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि सड़क किनारे मिली दवाएं सरकारी सप्लाई की हैं या किसी अन्य स्रोत से वहां पहुंची हैं। यही वजह है कि दवाओं पर दर्ज बैच नंबर और अन्य विवरण इस पूरे मामले में अहम कड़ी साबित हो सकते हैं।
एक्सपायरी दवाओं को खुले में फेंकना भी सवालों के घेरे में
मौके पर मिली दवाओं में कुछ ऐसी भी बताई जा रही हैं जिनकी एक्सपायरी डेट निकल चुकी है। एक्सपायरी दवाओं को सामान्य कचरे की तरह कहीं भी फेंकना उचित नहीं माना जाता। इन्हें निर्धारित प्रक्रिया के तहत अलग कर सुरक्षित तरीके से नष्ट किया जाता है।
ऐसे में यदि जांच में यह सामने आता है कि ये दवाएं पशु विभाग के किसी स्टोर या अस्पताल से निकली थीं और उन्हें नियमों को दरकिनार कर सड़क किनारे फेंका गया, तो मामला गंभीर हो सकता है।
सवाल सिर्फ दवाओं के फेंके जाने का नहीं है, बल्कि यह भी है कि इन दवाओं का रिकॉर्ड कहां है और इनके निस्तारण की प्रक्रिया किसके जिम्मे थी?
बैच नंबर से खुलेगा दवाओं का कनेक्शन
पशु विभाग के उपसंचालक राजीव गुप्ता ने मामले को लेकर स्पष्ट किया है कि दवाओं को खुले में नहीं फेंका जा सकता। उनका कहना है कि एक्सपायरी दवाओं को भी निर्धारित प्रक्रिया के तहत नष्ट किया जाता है।
उन्होंने बताया कि सड़क किनारे मिली दवाओं के बैच नंबर की जांच कराई जाएगी। बैच नंबर से यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि संबंधित दवाएं कहां से सप्लाई हुई थीं और वे जिला मुख्यालय के लिए थीं या जिले के किसी अन्य पशु अस्पताल के लिए।
यानी अब जांच की दिशा दवाओं के ढेर से निकलकर उनके सप्लाई रिकॉर्ड और स्टॉक रजिस्टर तक पहुंच सकती है। यदि बैच नंबर सरकारी रिकॉर्ड से मेल खाते हैं, तो यह भी पता लगाया जा सकेगा कि दवाएं किस अस्पताल या स्टोर को जारी की गई थीं और वहां से उनका हिसाब कैसे हुआ।
दवाएं सरकारी निकलीं तो कई सवालों के देने होंगे जवाब
यदि जांच में सड़क किनारे मिली दवाओं का संबंध पशु विभाग के सरकारी स्टॉक से सामने आता है, तो जिम्मेदारी तय करना विभाग के लिए बड़ी चुनौती होगी।
ऐसे में यह देखा जाएगा कि दवाएं कब खरीदी गईं, किस बैच की थीं, किस अस्पताल या स्टोर को कितनी मात्रा में भेजी गईं, उनका उपयोग कितना हुआ और बची हुई या एक्सपायरी दवाओं का निस्तारण किस तरह किया गया।
यदि रिकॉर्ड और मौके पर मिली दवाओं की संख्या में अंतर सामने आता है, तो मामला और गंभीर हो सकता है।
वहीं दूसरी ओर यदि दवाएं सरकारी स्टॉक की नहीं निकलती हैं तो यह भी जांच का विषय होगा कि पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली ये दवाएं आखिर कहां से आईं और किसने इन्हें सड़क किनारे फेंका।
सड़क किनारे दवाएं देखकर लोगों ने भी जताई चिंता
सड़क किनारे खुले में दवाएं पड़ी मिलने से स्थानीय लोगों में भी चिंता देखी गई। आमतौर पर लोग दवाओं को सुरक्षित रखने और निर्धारित तरीके से नष्ट करने की बात सुनते हैं, लेकिन यहां दवाएं खुले में पड़ी मिलीं।
विशेषज्ञों के अनुसार एक्सपायरी दवाओं का गलत तरीके से निस्तारण पर्यावरण और अन्य जीव-जंतुओं के लिए भी समस्या पैदा कर सकता है। खासकर ऐसी दवाएं जो पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होती हैं, उनके खुले में पड़े रहने से दूसरे पशुओं के संपर्क में आने की आशंका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अब जांच रिपोर्ट पर टिकी नजर
फिलहाल सड़क किनारे मिली दवाओं ने पशु विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि बिना जांच के यह कहना जल्दबाजी होगी कि दवाएं विभागीय स्टॉक की ही हैं या किसी निजी स्रोत से यहां लाई गई थीं।
लेकिन इतना जरूर है कि बैच नंबर, स्टॉक रिकॉर्ड और दवाओं की सप्लाई डिटेल इस पूरे मामले की तस्वीर साफ कर सकती है।
उपसंचालक राजीव गुप्ता ने भी जांच के बाद जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही है। अब देखना यह होगा कि जांच में दवाओं का कनेक्शन कहां तक पहुंचता है और सड़क किनारे एक्सपायरी दवाओं का यह ढेर महज लापरवाही का मामला निकलता है या फिर इसके पीछे विभागीय रिकॉर्ड और स्टॉक से जुड़ा कोई बड़ा सवाल सामने आता है।
फिलहाल सड़क किनारे पड़ी दवाओं ने एक सीधा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—जब एक्सपायरी दवाओं को नष्ट करने की तय प्रक्रिया है, तो फिर ये दवाएं सड़क किनारे किसने और क्यों फेंकीं?