अंगूठा लगवाया, पैसा उड़ाया! ‘नाम की सरपंच’ बनीं महिलाएं, केस उन्हीं पर दर्ज

Nikk Pandit
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सागर शर्मा शिवपुरी:खबर मध्यप्रदेश की पंचायतों में महिलाओं को 50% से ज्यादा प्रतिनिधित्व तो मिला, लेकिन जमीनी हकीकत चौंकाने वाली है। 1 जनवरी 2015 से 31 मार्च 2026 तक प्रदेश में 5000 सरपंचों पर भ्रष्टाचार के केस दर्ज हुए, जिनमें 753 महिला सरपंच (करीब 15%) शामिल हैं। सवाल यह है—क्या ये महिलाएं सच में दोषी हैं या सिस्टम की खामियों का शिकार? 

📊 आंकड़े क्या कहते हैं?

प्रदेश में कुल 23,011 सरपंचों में 11,683 महिलाएं हैं, लेकिन कई जगह ये महिलाएं सिर्फ नाम की सरपंच बनकर रह गईं। असली फैसले पति, रिश्तेदार या स्थानीय दबंग लेते रहे। जब गड़बड़ियां सामने आईं, तो कार्रवाई उन्हीं महिलाओं पर हुई, जिन्हें कई मामलों में यह तक नहीं पता कि उनके नाम पर क्या हुआ।

⚠️ कैसे हुआ खेल?

पड़ताल में सामने आया कि महिला सरपंचों से सिर्फ कागजों पर अंगूठा या साइन करवाए गए, और बाद में उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर भुगतान और काम दिखा दिए गए।

महिलाओं का दर्द साफ है—
👉 “हम तो बस नाम के सरपंच थे, पंचायत कोई और चला रहा था…”

📍 जमीनी उदाहरण

🔸 भैंसदही (धाबा पंचायत) – पूर्व सरपंच साहो परते पर 1.88 लाख अतिरिक्त खर्च का आरोप, जबकि उनका दावा है काम उनके पहले का है।

🔸 इटारसी (घाटली पंचायत) – मीना इवने मजदूरी करती थीं, गांव वालों के अनुसार उनकी आड़ में पंचायत चलाई गई; अब वे गांव छोड़ चुकी हैं।

🔸 गुना (रिजौदा-इमलिया) – सरपंच महिला, लेकिन पोर्टल पर पति के नाम दर्ज। एक ही पैटर्न के बिल, एक मजदूर को अलग-अलग जगह एक ही दिन काम दिखाया गया।

⚖️ कानून सख्त, असर उल्टा?

मप्र पंचायत राज अधिनियम 1993 की धारा 92 के तहत गबन साबित होने पर सरपंच से वसूली और सिविल जेल तक का प्रावधान है। यानी जिन महिलाओं को जानकारी तक नहीं, वे भी अब रिकवरी और कानूनी कार्रवाई झेल रही हैं।

📌 केस-1: धनियाबाई (शिवपुरी, रन्नौद पंचायत)
आज भी झोपड़ी में रहकर मजदूरी करती हैं।
👉 आरोप: करीब 10 लाख से ज्यादा की अनियमितता
👉 2017 में केस दर्ज, मामला अब भी लंबित

📌 केस-2: गांग्याबाई (बैतूल, राक्सी पंचायत)
75 साल की उम्र में बकरी चराकर जीवन यापन
👉 आरोप: 39 हजार की रिकवरी
👉 2021 में केस दर्ज, आज भी अनजान कि मामला क्या है

❗ सबसे बड़ा सवाल
क्या यह महिलाओं को सशक्त बनाने की व्यवस्था है, या फिर उन्हें आगे करके असली खेल कोई और खेल रहा है?
क्या सिस्टम उन “छिपे हाथों” तक पहुंचेगा, जो पर्दे के पीछे से पंचायत चला रहे हैं?
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