बंटी शर्मा शिवपुरी: खबर शिवपुरी में जिले कलेक्टर अर्पित वर्मा की जनसुनवाई में मंगलवार को एक ऐसा मामला सामने आया जिसने प्रशासनिक व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए।
कोलारस निवासी एक विधवा महिला अपने बेटे के साथ न्याय की उम्मीद लेकर कलेक्ट्रेट पहुंची और बताया कि वह पिछले 14 वर्षों से अनुकंपा नियुक्ति के लिए विभागों के चक्कर काट रही है। महिला की व्यथा सुनकर कलेक्टर अर्पित वर्मा ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जिला शिक्षा अधिकारी को तत्काल जांच और आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए।
स्वर्गीय शिक्षक महेश शाक्य की पत्नी ममता शाक्य ने बताया कि उनके पति ग्राम भदेनी के शासकीय प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत थे। वर्ष 2012 में सेवा के दौरान उनके निधन के बाद परिवार पर आर्थिक संकट टूट पड़ा। परिवार की स्थिति को देखते हुए अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया गया, लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी परिवार को राहत नहीं मिल सकी।
ममता शाक्य के अनुसार वर्ष 2013 में जिला शिक्षा कार्यालय में पहला आवेदन प्रस्तुत किया गया था, लेकिन उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उनके पुत्र मिलन शाक्य ने वर्ष 2017 में दोबारा आवेदन दिया, फिर भी फाइल आगे नहीं बढ़ी। परिवार का आरोप है कि पिछले डेढ़ दशक में उन्होंने सैकड़ों बार अधिकारियों के कार्यालयों के चक्कर लगाए, लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही मिला।
मिलन शाक्य का कहना है कि अनुकंपा नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ी आवश्यक परीक्षाएं लंबे समय तक आयोजित ही नहीं हुईं। वर्ष 2011 के बाद कई वर्षों तक परीक्षा नहीं होने के कारण उनका मामला आगे नहीं बढ़ सका। बाद में विभाग ने समय-सीमा समाप्त होने का हवाला देकर प्रकरण को निरस्त करने की बात कही। उनका तर्क है कि जब परीक्षा आयोजित कराना विभाग की जिम्मेदारी थी, तो उसकी देरी का खामियाजा उन्हें क्यों भुगतना पड़े।
युवक ने अपने आवेदन में शिक्षा विभाग के परिपत्रों और अन्य जिलों के उदाहरणों का हवाला देते हुए दावा किया है कि सात वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी पात्र आश्रितों को अनुकंपा नियुक्ति दी जा सकती है। उन्होंने खंडवा जिले के एक प्रकरण का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां निर्धारित अवधि के बाद भी आवेदक को नियुक्ति का लाभ दिया गया था। ऐसे में उनके मामले में अलग रवैया क्यों अपनाया जा रहा है, यह भी बड़ा सवाल है।
जनसुनवाई में पहुंचे इस परिवार ने प्रशासन से मांग की है कि उनके प्रकरण की निष्पक्ष समीक्षा कर शीघ्र निर्णय लिया जाए। उनका कहना है कि परिवार वर्षों से रोजगार और आर्थिक संबल की उम्मीद लगाए बैठा है। यदि नियमों के अंतर्गत उन्हें पात्र माना जाता है तो जल्द से जल्द नियुक्ति प्रदान की जानी चाहिए, ताकि परिवार को स्थायी राहत मिल सके।
यह मामला केवल एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि उन सैकड़ों लंबित अनुकंपा नियुक्ति प्रकरणों की कहानी भी बयां करता है जो वर्षों से फाइलों में दबे हुए हैं। मृतक कर्मचारियों के आश्रितों को तत्काल राहत देने के उद्देश्य से बनाई गई व्यवस्था यदि वर्षों तक निर्णय का इंतजार कराए, तो उसका उद्देश्य ही अधूरा रह जाता है। अब सबकी नजर कलेक्टर अर्पित वर्मा और शिक्षा विभाग पर टिकी है कि क्या 14 वर्षों से चल रहा यह ‘वनवास’ समाप्त होगा और मिलन शाक्य को आखिरकार न्याय मिल पाएगा या नहीं।