20 साल बाद पुराने अमोला में लौटे आराध्य देव:मड़ीखेड़ा विस्थापन के बाद बिछड़ी मूर्तियों की होगी प्राण प्रतिष्ठा, हजारों श्रद्धालुओं ने निकाली भव्य कलश यात्रा

Nikk Pandit
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बंटी शर्मा शिवपुरी:खबर शिवपुरी जिले के करेरा में आस्था, श्रद्धा और भावनाओं से जुड़ा एक ऐतिहासिक क्षण शनिवार को उस समय देखने को मिला जब मड़ीखेड़ा डूब क्षेत्र में विस्थापित हुए पुराने अमोला गांव के आराध्य देव 20 साल बाद अपने मूल धाम में पुनः विराजमान होने की ओर बढ़े। हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में भव्य कलश यात्रा निकाली गई और पांच दिवसीय प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव का शुभारंभ हुआ।

मड़ीखेड़ा परियोजना के कारण करीब दो दशक पहले अमोला गांव को खाली कराकर करैरा के पास नए अमोला में बसाया गया था। गांव के मंदिरों से देवी-देवताओं की मूर्तियों को भी हटाना पड़ा था। तब से ये मूर्तियां अलग-अलग स्थानों पर स्थापित थीं, लेकिन ग्रामीणों के मन में हमेशा अपने आराध्य देवों को मूल स्थान पर पुनः स्थापित करने की इच्छा बनी रही।

ग्रामीणों ने मिलकर बनाया नया मंदिर

ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि गांव भले ही विस्थापित हो गया हो, लेकिन उनकी आस्था और आराध्य देवों का मूल स्थान नहीं बदलेगा। इसी संकल्प के साथ पुराने अमोला में मां के प्राचीन मंदिर के समीप नए मंदिर का निर्माण कराया गया।

मंदिर निर्माण में समाजसेवी संतोष नीखरा (सेठ) सहित क्षेत्र के अनेक लोगों का विशेष सहयोग रहा। ग्रामीणों के सामूहिक प्रयासों से वर्षों पुराना सपना अब साकार होता नजर आ रहा है।

जयकारों से गूंज उठा पूरा क्षेत्र

शनिवार को निकाली गई कलश यात्रा में हजारों महिलाओं ने सिर पर कलश धारण कर भाग लिया। पुरुष, महिलाएं, बच्चे, कन्याएं और विस्थापित परिवारों के सदस्य बड़ी संख्या में शामिल हुए। पूरे मार्ग पर धार्मिक भजनों, जयकारों और श्रद्धा के भाव से वातावरण भक्तिमय बना रहा।

20 साल का इंतजार हुआ पूरा

ग्रामीणों का कहना है कि यह सिर्फ मूर्तियों की स्थापना नहीं, बल्कि उनके इतिहास, संस्कृति और आस्था की पुनर्स्थापना है। वर्षों बाद अपने आराध्य देवों को मूल धाम में पुनः विराजमान होते देख लोगों की आंखें नम हो गईं।

17 जून को होगा महाभंडारा

आयोजन समिति के अनुसार, पांच दिवसीय प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव का समापन 17 जून को हवन-पूजन, कन्या भोज और विशाल भंडारे के साथ होगा। कार्यक्रम का संचालन यज्ञाचार्य पंडित अरविंद कुमार शास्त्री एवं अन्य विद्वान आचार्यों द्वारा किया जा रहा है।

ग्रामीणों का मानना है कि 20 वर्षों बाद आराध्य देवों की घर वापसी केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उनकी आस्था, संस्कृति और विरासत का पुनर्जागरण है।
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