25 साल से झील में बहता रहा सीवर, अब हाईकोर्ट सख्त: बोला- 'सालों से हो रहा है, इसलिए सही नहीं हो जाता अवैध काम'

Nikk Pandit
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बंटी शर्मा शिवपुरी:खबर शिवपुरी जिले में माधव नेशनल पार्क और हाल ही में घोषित टाइगर रिजर्व के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाने वाली सांख्य सागर झील में शहर का सीवर और गंदा पानी छोड़े जाने के मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने वन विभाग और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (पीएचई) को कड़ी फटकार लगाई है। मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि "कोई अवैध कार्य यदि 25 साल से चल रहा है तो उससे वह वैध नहीं हो जाता।

यह मामला शिवपुरी निवासी आदित्य राज पांडे द्वारा दायर जनहित याचिका के माध्यम से हाईकोर्ट पहुंचा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि शहर के नालों और सीवर का गंदा पानी लगातार सांख्य सागर झील में छोड़ा जा रहा है, जिससे झील का पानी प्रदूषित हो रहा है और वन्यजीवों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

कोर्ट में पेश हुए पार्क के उप संचालक

मामले की सुनवाई के दौरान माधव नेशनल पार्क के उप संचालक हरिओम व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित हुए। उन्होंने अदालत को बताया कि पिछले लगभग 25 वर्षों से झील में वेस्ट मटेरियल और गंदा पानी पहुंच रहा है, इसलिए इसमें किसी की गलत मंशा नहीं मानी जानी चाहिए।

इस दलील पर कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि किसी अवैध गतिविधि के लंबे समय से जारी रहने मात्र से उसे कानूनी मान्यता नहीं मिल जाती। अदालत ने यह भी पूछा कि बिना किसी स्वतंत्र और वैज्ञानिक जांच के वन विभाग ने संबंधित एजेंसियों को क्लीन चिट कैसे दे दी।

'इंसानी मल वाला पानी वन्यजीवों के लिए सुरक्षित कैसे?'

सुनवाई के दौरान वन विभाग की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि सांख्य सागर झील का पानी 'डी श्रेणी' का है और उसमें इंसानी मल तथा अन्य जैविक अपशिष्ट मिलने के बावजूद वह वन्यजीवों के उपयोग के लिए उपयुक्त माना जा सकता है।

इस दलील पर अदालत ने गंभीर आपत्ति जताते हुए पूछा कि इसका वैज्ञानिक आधार क्या है। कोर्ट ने सवाल किया कि जब पानी में इंसानी मल, बैक्टीरिया और अन्य प्रदूषक मौजूद हैं तो उसे वन्यजीवों के लिए सुरक्षित कैसे माना जा सकता है? अदालत ने वन विभाग से इस संबंध में वैज्ञानिक प्रमाण प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

कोर्ट ने यह भी पूछा कि इतनी गंभीर स्थिति होने के बावजूद वन विभाग ने अब तक झील के पानी की स्वतंत्र और विस्तृत गुणवत्ता जांच क्यों नहीं कराई।

पीएचई विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल

सुनवाई के दौरान पीएचई विभाग की कार्यप्रणाली भी अदालत के निशाने पर रही। कोर्ट के समक्ष जानकारी आई कि विभाग द्वारा करोड़ों रुपये खर्च कर सीवरेज लाइन परियोजना शुरू की गई थी, लेकिन इसके लिए स्थानीय नगर पालिका के साथ पर्याप्त समन्वय नहीं किया गया।

याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि परियोजना शुरू होने के बावजूद शहर के कई घरों को सीवरेज नेटवर्क से नहीं जोड़ा जा सका। परिणामस्वरूप बड़ी मात्रा में गंदा पानी और सीवर अब भी नालों के माध्यम से झील तक पहुंच रहा है, जिससे पूरी योजना का उद्देश्य अधूरा रह गया।

एफआईआर तक पहुंच सकता है मामला

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि नेशनल पार्क क्षेत्र के जल स्रोत को प्रदूषित करना और प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाना वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।

अदालत ने सवाल उठाया कि जब वर्षों से झील में प्रदूषण फैलाया जा रहा था तो वन विभाग ने जिम्मेदार अधिकारियों, विभागों या एजेंसियों के खिलाफ अब तक कोई एफआईआर दर्ज क्यों नहीं कराई।

कोर्ट के सख्त रुख को देखते हुए माना जा रहा है कि आगामी सुनवाई में जिम्मेदारी तय करने, उच्च स्तरीय जांच कराने और दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के निर्देश दिए जा सकते हैं।

पूरे मामले पर शिवपुरी की नजर

सांख्य सागर झील न केवल माधव नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व के वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोत है, बल्कि यह शिवपुरी की प्राकृतिक पहचान का भी प्रमुख हिस्सा है। ऐसे में झील में सीवर और गंदे पानी के प्रवाह का मामला अब प्रशासनिक और पर्यावरणीय स्तर पर बड़ा मुद्दा बन गया है।

अब सभी की निगाहें हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इस मामले में बड़ा फैसला आने और जिम्मेदारों पर कार्रवाई होने की संभावना जताई जा रही है।
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