बंटी शर्मा शिवपुरी:खबर शिवपुरी शहर के वार्ड क्रमांक 17 स्थित पठारे कब्रिस्तान के पीछे रहने वाले आदिवासी और सहरिया समाज के दर्जनों परिवारों की जिंदगी हाल ही में आई आंधी और बारिश ने पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दी है। अपने आशियाने उजड़ने के बाद सोमवार को पीड़ित परिवार एक बार फिर कलेक्ट्रेट पहुंचे और प्रशासन से राहत, आर्थिक सहायता तथा स्थायी आवास की मांग की। परिवारों का कहना है कि वे वर्षों से शासकीय भूमि पर झुग्गी-झोपड़ियां बनाकर जीवनयापन कर रहे हैं, लेकिन अब उनके सिर से छत भी छिन गई है।
🌪️ 29 मई की आंधी बनी आफत
पीड़ित परिवारों के अनुसार 29 मई को आई तेज आंधी और भारी बारिश ने उनकी झुग्गियों, तिरपालों और अस्थायी आशियानों को पूरी तरह तबाह कर दिया। कई परिवारों का घरेलू सामान, कपड़े और राशन भी बारिश में खराब हो गया। हालात ऐसे बन गए कि लोगों को खुले आसमान के नीचे रातें बिताने के लिए मजबूर होना पड़ा।
बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के सामने सबसे बड़ी समस्या सिर छिपाने और भोजन की खड़ी हो गई है।
बारिश में भीगकर काटनी पड़ी रात
प्रभावित महिलाओं ने बताया कि आंधी के बाद किसी तरह अस्थायी व्यवस्था कर परिवारों ने रातें गुजारीं, लेकिन रविवार रात हुई बारिश ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दीं। पूरी रात परिवारों को भीगते हुए बितानी पड़ी। सबसे चिंताजनक बात यह है कि 29 मई से अब तक कई घरों में चूल्हा तक नहीं जला, जिससे भोजन का गंभीर संकट पैदा हो गया है। छोटे-छोटे बच्चे और बुजुर्ग भूख और बदहाली के बीच दिन गुजार रहे हैं।
तीसरी बार कलेक्टर से लगाई गुहार
आदिवासी समाज की सपना आदिवासी ने बताया कि प्रभावित परिवार तीसरी बार कलेक्टर कार्यालय पहुंचे हैं, लेकिन अब तक उनकी समस्याओं का कोई स्थायी समाधान नहीं निकला है। परिवारों ने प्रशासन से मांग की है कि मौके पर पहुंचकर नुकसान का सर्वे कराया जाए और तत्काल आर्थिक सहायता प्रदान की जाए ताकि वे दोबारा अपना जीवन सामान्य कर सकें।
पट्टा और प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ देने की मांग
पीड़ित परिवारों ने प्रशासन से यह भी मांग की है कि वर्षों से यहां निवास कर रहे लोगों को स्थायी आवासीय पट्टे दिए जाएं तथा प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास उपलब्ध कराए जाएं। उनका कहना है कि हर साल बारिश और आंधी में झुग्गियां उजड़ जाती हैं और उन्हें बार-बार बेघर होने की पीड़ा झेलनी पड़ती है।
आखिर कब मिलेगी राहत?
बड़ा सवाल यह है कि आखिर इन गरीब और जरूरतमंद परिवारों की पुकार कब सुनी जाएगी? क्या प्रशासन इनके नुकसान का आकलन कर त्वरित सहायता देगा? क्या वर्षों से झुग्गियों में जीवन बिता रहे इन परिवारों को स्थायी छत मिल पाएगी? फिलहाल इन सवालों के जवाब का इंतजार पूरा आदिवासी बस्ती कर रही है।